अंबेडकर नगर: स्नेहा की मौत और प्रेमी सौरभ की खुदकुशी, पुलिस पर उठे गंभीर सवाल
अंबेडकर नगर: उत्तर प्रदेश के अंबेडकर नगर से एक ऐसी दुखद और उलझी हुई घटना सामने आई है, जिसने न केवल इलाके को दहला दिया है, बल्कि खाकी की कार्यप्रणाली पर भी बड़े सवालिया निशान लगा दिए हैं। यह मामला इश्क, इल्जाम और फिर दो मौतों की एक ऐसी दास्तां है, जिसकी गुत्थी सुलझने के बजाय और उलझती जा रही है।
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क्या है पूरा मामला?
मामले की शुरुआत 2 दिसंबर को राजेसुल्तानपुर थाना क्षेत्र से हुई, जब स्नेहा नाम की एक युवती अचानक लापता हो गई। परिजनों ने काफी तलाश की और 4 दिसंबर को गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई। पुलिस हाथ-पांव मारती रही, लेकिन 17 दिनों तक युवती का सुराग नहीं मिला। हैरान करने वाली बात यह रही कि स्नेहा का शव उसके घर से महज 100 मीटर की दूरी पर सड़ती हुई हालत में मिला। पुलिस की मुस्तैदी पर यहीं से सवाल उठने शुरू हो गए कि जो लाश घर के ठीक बगल में थी, उसे खोजने में 17 दिन क्यों लग गए?
प्रेमी पर लगा आरोप और खौफनाक अंत
स्नेहा की मौत का सीधा आरोप उसके प्रेमी सौरभ पर लगा। सौरभ और स्नेहा का प्रेम संबंध करीब एक साल पुराना था। पिछले साल स्नेहा के घर पकड़े जाने पर सौरभ जेल भी गया था और नवंबर में ही जमानत पर बाहर आया था। स्नेहा की लाश मिलने के बाद पुलिस ने सौरभ के खिलाफ हत्या की धाराएं बढ़ा दीं और उसकी तलाश तेज कर दी।
सौरभ के परिजनों का आरोप है कि इस दौरान पुलिस ने उन्हें मानसिक रूप से काफी प्रताड़ित किया। इसी बीच, 24 दिसंबर को आजमगढ़ के अतरौलिया में एक पेड़ से सौरभ का शव लटका मिला। मरने से पहले सौरभ ने अपनी पैंट की जेब पर ही सुसाइड नोट लिख दिया था, जिसमें उसने साफ शब्दों में लिखा— "मैंने स्नेहा की हत्या नहीं की।" उसने अपनी बेगुनाही की चीख उस कपड़े पर छोड़ दी और साथ में प्रेमिका का मोबाइल नंबर भी लिख दिया।
पुलिस की भूमिका और जनता पर असर
इस घटना ने स्थानीय पुलिस की छवि को गहरा धक्का पहुँचाया है। 15 दिनों तक पुलिस न तो लड़की को ढूंढ पाई और न ही आरोपी को। लोगों के बीच यह चर्चा आम है कि क्या पुलिसिया दबाव और बदनामी के डर ने एक युवक को जान देने पर मजबूर कर दिया? इस डबल डेथ मिस्ट्री ने समाज में कानून व्यवस्था के प्रति अविश्वास पैदा किया है।
यूपी प्राइम न्यूज़ एनालिसिस (Analysis):
कानूनी नजरिए से देखें तो सौरभ की मौत ने इस केस को और जटिल बना दिया है। यदि सौरभ वाकई बेगुनाह था, तो स्नेहा का असली कातिल अब भी आजाद है। पुलिस की शुरुआती सुस्ती और बाद में बढ़ते दबाव ने एक संभावित गवाह या आरोपी को खो दिया है। अब यह देखना होगा कि क्या पुलिस अपनी फाइलों में दबे इस सच को सामने ला पाती है या यह मामला महज़ एक 'क्लोजर रिपोर्ट' बनकर रह जाएगा।

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