उन्नाव कांड: कुलदीप सेंगर को मिली जमानत, सहमी पीड़िता बोली- 'अब हमारी जान को खतरा'
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नई दिल्ली/उन्नाव: उन्नाव रेप कांड के मुख्य दोषी और पूर्व भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को दिल्ली हाई कोर्ट से जमानत मिलने के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति और न्याय व्यवस्था एक बार फिर चर्चा में है। कोर्ट के इस फैसले के बाद पीड़िता और उसका परिवार गहरे खौफ में है।
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पीड़िता का छलका दर्द: "यह फैसला हमारे लिए काल है"
हाईकोर्ट का फैसला आने के बाद पीड़िता ने मीडिया से बात करते हुए अपनी जान का खतरा बताया। रोते हुए पीड़िता ने कहा, "आज उन्हें जमानत मिली है, कल हमारा घर छीन लिया जाएगा और फिर हमें मार दिया जाएगा।" पीड़िता ने बताया कि जब कोर्ट आदेश सुना रहा था, वह अपनी माँ के साथ वहीं मौजूद थी। उसने विरोध करने की कोशिश की, लेकिन पुलिस ने उसे हटा दिया।
पीड़िता का कहना है कि पहले उनके गवाहों और परिवार की सुरक्षा हटाई गई और अब मुख्य आरोपी का जेल से बाहर आना उनके लिए किसी 'मौत के फरमान' से कम नहीं है। 2023 में सुरक्षा के लिहाज से आजमगढ़ के एक युवक से गुप्त रूप से शादी करने वाली पीड़िता फिलहाल दिल्ली में अपने पति और बच्चों के साथ रहती है, लेकिन उसका कहना है कि सेंगर के बाहर आने के बाद उसका कहीं भी सुरक्षित रहना मुश्किल होगा।
इंडिया गेट पर विरोध प्रदर्शन
जमानत के फैसले के खिलाफ महिला अधिकार कार्यकर्ता योगिता भयाना ने मंगलवार रात इंडिया गेट के सामने धरना देने की कोशिश की। हालांकि, दिल्ली पुलिस ने उन्हें और उनके साथियों को हिरासत में लिया और बाद में थाने ले जाकर छोड़ दिया।
खूनी रंजिश का काला इतिहास
इस पूरे मामले की जड़ें साल 2002 के प्रधानी चुनाव से जुड़ी हैं। पीड़िता के ताऊ और कुलदीप सेंगर की माँ के बीच चुनावी मुकाबला हुआ था, जिसके बाद दोनों परिवारों में दुश्मनी पैदा हो गई। आरोप है कि सेंगर ने राजनीतिक रसूख का इस्तेमाल कर पीड़िता के परिवार को बर्बाद कर दिया।
2017: पीड़िता ने आरोप लगाया कि कुलदीप सेंगर ने अपने घर पर उसके साथ दुष्कर्म किया।
पिता की मौत: पीड़िता के पिता को झूठे आर्म्स एक्ट में जेल भेजा गया, जहाँ पुलिस कस्टडी में उनकी मौत हो गई।
गवाहों का खात्मा: एक संदिग्ध सड़क हादसे में पीड़िता की चाची और मौसी की जान चली गई, जबकि पीड़िता खुद गंभीर रूप से घायल हुई थी।
सार्वजनिक प्रभाव (Public Impact):
इस तरह के हाई-प्रोफाइल मामलों में दोषियों को मिलने वाली राहत समाज में एक नकारात्मक संदेश भेजती है। इससे न केवल पीड़िता का मनोबल टूटता है, बल्कि अन्य अपराध पीड़ितों के मन में भी न्याय व्यवस्था के प्रति अविश्वास पैदा होता है। सुरक्षा की चिंता के कारण गवाहों के पीछे हटने का खतरा भी बढ़ जाता है।
पत्रकारिता विश्लेषण (Analysis):
कानूनी तौर पर जमानत मिलना एक प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है, लेकिन इस केस की संवेदनशीलता और पीड़िता के परिवार के साथ हुए 'खूनी अतीत' को देखते हुए सुरक्षा संबंधी चिंताएं जायज हैं। न्याय का अर्थ सिर्फ फैसला सुनाना नहीं, बल्कि पीड़ित को सुरक्षित महसूस कराना भी है। शासन-प्रशासन के लिए अब सबसे बड़ी चुनौती पीड़िता और उसके परिवार को पूर्ण सुरक्षा सुनिश्चित करना होगी।

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