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वाराणसी टक्साल सिनेमा शूटआउट: अभय सिंह की रिहाई के खिलाफ हाईकोर्ट जाएगा धनंजय सिंह का खेमा, 22 साल पुरानी सियासी जंग में नया मोड़

 उत्तर प्रदेश वाराणसी

वाराणसी की एक विशेष अदालत द्वारा 22 साल पुराने बहुचर्चित टक्साल सिनेमा शूटआउट मामले में सुनाए गए फैसले ने उत्तर प्रदेश के सियासी और कानूनी गलियारों में हलचल तेज कर दी है। वाराणसी की एमपी-एमएलए (MP-MLA) कोर्ट ने साक्ष्यों के अभाव का हवाला देते हुए समाजवादी पार्टी के विधायक अभय सिंह, एमएलसी विनीत सिंह और अन्य सभी आरोपियों को दोषमुक्त करार दिया है। हालांकि, इस फैसले से असंतुष्ट पूर्व सांसद धनंजय सिंह की लीगल टीम ने अब इस कानूनी लड़ाई को इलाहाबाद हाईकोर्ट ले जाने का ऐलान कर दिया है।

टक्साल सिनेमा शूटआउट केस वाराणसी धनंजय सिंह बनाम अभय सिंह









4 अक्टूबर 2002 को वाराणसी के नदेसर इलाके में हुए इस हमले ने उस वक्त पूरे प्रदेश को दहला दिया था। पूर्व सांसद धनंजय सिंह के काफिले पर अंधाधुंध फायरिंग की गई थी, जिसमें वह खुद और उनके कई साथी गंभीर रूप से घायल हो गए थे। धनंजय सिंह ने आरोप लगाया था कि यह हमला उनकी जान लेने की नीयत से किया गया था। लंबे समय तक चली इस कानूनी प्रक्रिया में बुधवार को निचली अदालत ने अपना फैसला सुनाया। विशेष न्यायाधीश यजुवेंद्र विक्रम सिंह ने मामले की सुनवाई पूरी करते हुए सभी छह आरोपियों को बरी कर दिया, जिसके बाद वाराणसी में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई थी।

धनंजय सिंह की लीगल टीम ने कोर्ट के इस फैसले पर कई सवाल उठाए हैं। टीम का तर्क है कि अभियोजन पक्ष और जांच एजेंसियों के स्तर पर कुछ ऐसी खामियां रहीं या रखी गईं, जिसका फायदा आरोपियों को मिला। लीगल टीम अब जजमेंट की बारीकियों का अध्ययन कर रही है। उनका दावा है कि वे जल्द ही उच्च न्यायालय में अपील दायर करेंगे ताकि इस मामले में फिर से न्याय की गुहार लगाई जा सके। धनंजय सिंह का कहना है कि उन्होंने इस केस को पूरी ईमानदारी से लड़ा, लेकिन उस दौर की राजनीतिक परिस्थितियों ने जांच और कार्रवाई को प्रभावित किया।

इस मामले में सबसे विवादित पहलू 'अस्पताल की थ्योरी' और 'वाहनों के दस्तावेज' रहे हैं। सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष यानी अभय सिंह की ओर से यह दलील दी गई थी कि घटना के समय वे अयोध्या के एक अस्पताल में भर्ती थे। धनंजय सिंह के वकीलों ने इस दावे को सिरे से खारिज करते हुए आरोप लगाया है कि बचाव के लिए फर्जी मेडिकल दस्तावेज तैयार किए गए थे। उनका आरोप है कि अस्पताल के रजिस्टर में मेडिकल एंट्री बाद में की गई थी। लीगल टीम का सवाल है कि अगर अभय सिंह वास्तव में वहां शामिल नहीं थे, तो उसी समय सच्चाई स्पष्ट क्यों नहीं की गई।

इसके अलावा, गाड़ी के नंबर को लेकर भी कोर्ट में तीखी बहस देखने को मिली। बचाव पक्ष ने दावा किया था कि जिस वाहन का जिक्र किया जा रहा है, वह एक जेसीबी (JCB) का नंबर है। लेकिन धनंजय सिंह के खेमे का कहना है कि वह जेसीबी साल 2004 में रजिस्टर हुई थी, जबकि हमला 2002 में हुआ था। वाहन दस्तावेजों में एक अक्षर की तकनीकी गड़बड़ी को आधार बनाकर आरोपियों को संदेह का लाभ (Benefit of Doubt) दिया गया। साथ ही, मोबाइल नंबरों के कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) को लेकर भी शिकायत दर्ज कराई गई है कि गलत जानकारी को केस से जोड़ने का प्रयास किया गया।

उत्तर प्रदेश की राजनीति में धनंजय सिंह और अभय सिंह के बीच की अदावत जगजाहिर है। एक समय में दोनों लखनऊ विश्वविद्यालय के दिनों में गहरे दोस्त हुआ करते थे, लेकिन वक्त के साथ यह दोस्ती कट्टर दुश्मनी में तब्दील हो गई। धनंजय सिंह का आरोप है कि अभय सिंह को हमेशा से 'अनचाहा राजनीतिक लाभ' मिलता रहा है। इस मामले में अभय सिंह का नाम मुख्तार अंसारी के गैंग चार्ट में होने का दावा भी किया गया था, जिसने इस केस को और अधिक हाई-प्रोफाइल बना दिया था। अब जबकि निचली अदालत ने फैसला सुना दिया है, तो सबकी निगाहें हाईकोर्ट की ओर टिकी हैं।

खबर का बैकग्राउंड:

यह मामला 4 अक्टूबर 2002 का है जब वाराणसी के नदेसर स्थित टक्साल सिनेमा के पास धनंजय सिंह के काफिले पर हमला हुआ था। इस शूटआउट में धनंजय सिंह बाल-बाल बचे थे लेकिन घायल हुए थे। केस में अभय सिंह, विनीत सिंह समेत 6 लोग आरोपी थे। 22 साल चली लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद 2024 में साक्ष्यों की कमी के कारण आरोपियों को बरी किया गया है।

पब्लिक इम्पैक्ट:

इस तरह के हाई-प्रोफाइल 'बाहुबली' मामलों के फैसलों का आम जनता के बीच कानून व्यवस्था पर विश्वास से सीधा संबंध होता है। 22 साल बाद आए इस फैसले और अब हाईकोर्ट जाने की तैयारी से यह संदेश जाता है कि रसूखदार लोगों के मामलों में कानूनी प्रक्रिया अत्यंत जटिल और लंबी हो सकती है। स्थानीय स्तर पर राजनीतिक तनाव बढ़ने की भी संभावना रहती है।

UP Prime News एनालिसिस:

यह मामला केवल एक कानूनी लड़ाई नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश की दो बड़ी राजनीतिक ताकतों के वर्चस्व की जंग है। साक्ष्यों के अभाव में मिली रिहाई और फिर ऊपरी अदालत की चुनौती यह दर्शाती है कि आने वाले दिनों में पूर्वांचल की राजनीति में कानूनी दांव-पेंच और तीखे होंगे।

वाराणसी | UP Prime News

Published: April 16, 2026 | 04:52 PM IST

By UP Prime News Desk



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