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इलाहाबाद हाईकोर्ट का ‘हंटर’: सिर्फ शिकायत पर अस्पताल सील करना पड़ा भारी, अफसरों की जल्दबाजी पर सरकार को 20 हजार का जुर्माना

 प्रयागराज/महराजगंज (UP Prime News):

उत्तर प्रदेश में अधिकारियों की मनमानी और बिना ठोस सबूतों के कार्रवाई करने की आदत पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कड़ा प्रहार किया है। महराजगंज के सोनौली में एक निजी अस्पताल को 'सिर्फ शिकायत' के आधार पर सील करने के मामले में कोर्ट ने न केवल नाराजगी जताई है, बल्कि राज्य सरकार पर 20,000 रुपये का जुर्माना भी ठोंक दिया है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट। - फोटो :-up prime news








कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बिना किसी मरीज या डॉक्टरी पर्चे (Prescription) के सबूत मिले, केवल किसी के कहने पर अस्पताल पर ताला जड़ देना कानूनन गलत है।

क्या है पूरा मामला? (Inside Story)

घटना की शुरुआत जुलाई 2025 में हुई। एक कर्मचारी ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई कि महराजगंज के सोनौली स्थित एक निर्माणाधीन अस्पताल में सरकारी दवाएं और एक्सपायर्ड लैब किट रखी हुई हैं।

इस शिकायत को आधार बनाकर सोनौली थाने ने जिला मजिस्ट्रेट को रिपोर्ट भेजी।

5 जुलाई 2025 को एक टीम ने अस्पताल का दौरा किया और बिना किसी ठोस जांच के अस्पताल को सील कर दिया।

अस्पताल के संचालक डॉ. नरेश कुमार गुप्ता ने इस कार्रवाई को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी।

कोर्ट रूम ड्रामा: जब जजों ने पूछे तीखे सवाल

मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अनीश कुमार गुप्ता की खंडपीठ कर रही थी। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने सरकारी वकील से जो सवाल किए, उसने प्रशासन की पोल खोल दी:

कोर्ट का सवाल: क्या निरीक्षण के दौरान अस्पताल में कोई मरीज भर्ती मिला?

सरकारी वकील: जी नहीं, कोई मरीज नहीं मिला।

कोर्ट का सवाल: क्या अस्पताल चालू हालत (Running condition) में था?

सरकारी वकील: नहीं।

कोर्ट का सवाल: क्या टीम को कोई डॉक्टरी पर्चा या दवाओं की बिक्री का कोई सबूत मिला?

सरकारी वकील: जवाब नकारात्मक था (नहीं मिला)।

याची की दलील: 'अभी तो अस्पताल बन ही रहा था'

UP Prime News को मिली जानकारी के मुताबिक, अस्पताल संचालक (याची) के अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि अस्पताल अभी 'निर्माण के अंतिम चरण' में था।

संचालक ने बताया कि उन्होंने पंजीकरण के लिए आवेदन किया था, लेकिन प्रदूषण नियंत्रण, बायोमेडिकल कचरा निस्तारण और फायर सेफ्टी की कमियों के कारण उसे खारिज कर दिया गया था।

वे इन कमियों को सुधारकर दोबारा निरीक्षण के लिए विभाग को बुलाने वाले थे, लेकिन उससे पहले ही अधिकारियों ने शिकायत के आधार पर सील लगा दी।

फैसला: अधिकारियों की जेब से वसूला जाएगा जुर्माना

कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि प्रतिवादी अधिकारियों ने बेहद जल्दबाजी में कार्रवाई की है। जब अस्पताल बिना पंजीकरण के चल ही नहीं रहा था और वहां कोई मरीज नहीं था, तो उसे सील करने का कोई आधार नहीं बनता।

जुर्माना: कोर्ट ने राज्य सरकार पर 20,000 रुपये का जुर्माना लगाया है। कोर्ट ने यह भी छूट दी है कि सरकार चाहे तो यह राशि दोषी अधिकारियों से वसूल सकती है।

आदेश: कोर्ट ने तत्काल प्रभाव से अस्पताल की सील खोलने का आदेश दिया है।

UP Prime News का नजरिया

यह फैसला उन अधिकारियों के लिए एक सबक है जो बिना जांच-पड़ताल के कार्रवाई कर देते हैं। हाईकोर्ट ने साफ कर दिया है कि कानून 'सबूतों' पर चलता है, न कि सिर्फ 'शिकायतों' पर।

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