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UP में बड़ी हलचल! बिजनौर DM का सरकारी बंगला होगा कुर्क, मुरादाबाद कोर्ट ने सुनाया ऐतिहासिक फैसला

 मुरादाबाद/बिजनौर: उत्तर प्रदेश के प्रशासनिक गलियारों में उस वक्त हड़कंप मच गया जब मुरादाबाद की एक अदालत ने बिजनौर के जिलाधिकारी (DM) के सरकारी आवास को कुर्क करने का कड़ा आदेश जारी कर दिया। यह मामला जमीन अधिग्रहण के मुआवजे से जुड़ा है, जिसमें प्रशासन की लापरवाही पर कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है।

कोर्ट सांकेतिक फोटो :- up prime news

क्या है पूरा मामला? (UP Prime News की रिपोर्ट)

यह पूरा विवाद जमीन अधिग्रहण के बदले दिए जाने वाले मुआवजे को लेकर है। UP Prime News को मिली जानकारी के अनुसार, भूमि स्वामी उमेश की जमीन का अधिग्रहण किया गया था, लेकिन लंबे समय से उन्हें मुआवजे की राशि नहीं मिली।

इस मामले में 'मुरादाबाद की लारा कोर्ट' (भूमि अर्जन पुनर्वासन एवं पुनर्व्यवस्थापन प्राधिकरण) ने स्पष्ट किया कि 13 मार्च 2020 को ही मुआवजे के भुगतान का निर्णय लिया गया था। इसके बावजूद, पिछले 4 वर्षों से पीड़ित पक्ष को उनकी धनराशि नहीं दी गई।

कोर्ट ने क्यों लिया इतना सख्त फैसला?

सुनवाई के दौरान यह बात सामने आई कि जिला प्रशासन के पास पर्याप्त धनराशि होने के बावजूद उन्होंने भुगतान नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि:

  • प्रशासन की ओर से इस मामले में कोई ठोस जवाब दाखिल नहीं किया गया।

  • पहले भी 41(2) CPC के तहत नोटिस और आदेश 21 नियम 37 CPC की कार्रवाई की जा चुकी थी, लेकिन डीएम कार्यालय ने इसे गंभीरता से नहीं लिया।

  • अंततः कोर्ट ने आदेश 21 नियम 54 CPC के तहत बिजनौर कलेक्टर के राजकीय आवास (डीएम बंगला) को कुर्क करने का आदेश दे दिया।

9 जनवरी 2026 को बड़ी पेशी

कोर्ट ने न केवल कुर्की का आदेश दिया है, बल्कि बिजनौर डीएम को 9 जनवरी 2026 को अदालत में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का निर्देश भी दिया है। उस दिन कुर्की की गई संपत्ति की बिक्री और उसकी शर्तों को तय किया जाएगा।

कुर्की के दौरान क्या होगा?

अदालत के आदेशानुसार, जब तक यह मामला पूरी तरह नहीं सुलझता:

  1. बिजनौर कलेक्टर अपने इस आवास को किसी को ट्रांसफर नहीं कर सकेंगे।

  2. इस संपत्ति का उपयोग किसी भी आर्थिक लाभ के लिए नहीं किया जा सकेगा।

  3. हालांकि, कार्यालय की क्षमता के अनुसार वे फिलहाल इसमें रह सकेंगे, लेकिन संपत्ति कानूनी रूप से कुर्क मानी जाएगी।

UP Prime News के पाठकों के लिए बता दें कि सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए अदालत ने कहा है कि किसी भी निष्पादन वाद (Execution Case) का निपटारा 6 महीने के भीतर हो जाना चाहिए, जबकि यह मामला 4 साल से लटका हुआ है।


निष्कर्ष: यह फैसला उन अधिकारियों के लिए एक बड़ी चेतावनी है जो अदालती आदेशों और जनता के मुआवजे को गंभीरता से नहीं लेते। अब देखना यह होगा कि 9 जनवरी की तारीख से पहले क्या प्रशासन मुआवजे का भुगतान करता है या नहीं।

ऐसी ही सटीक और ताज़ा खबरों के लिए बने रहें "UP Prime News" के साथ।



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