स्मृति ईरानी का अखिलेश यादव पर तीखा पलटवार: 'सास-बहू सीरियल छोड़िए और गोरखपुर से चुनाव लड़कर दिखाइए'
वाराणसी (उत्तर प्रदेश):
भारतीय राजनीति में शब्दों के बाण और जुबानी जंग कोई नई बात नहीं है, लेकिन जब बात देश के दो बड़े चेहरों—स्मृति ईरानी और अखिलेश यादव—के बीच हो, तो सियासत का पारा चढ़ना स्वाभाविक है। हाल ही में संसद के विशेष सत्र के दौरान शुरू हुई एक बहस अब सड़क और प्रेस कॉन्फ्रेंस तक पहुंच चुकी है। पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव द्वारा उन पर की गई 'सास-बहू' की टिप्पणी का कड़ा संज्ञान लेते हुए वाराणसी में उन पर जोरदार पलटवार किया है। स्मृति ईरानी ने न केवल अखिलेश यादव की राजनीतिक विरासत पर सवाल उठाए, बल्कि उन्हें उनके सुरक्षित गढ़ को छोड़कर गोरखपुर से चुनाव लड़ने की खुली चुनौती भी दे डाली है।
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| स्मृति ईरानी और अखिलेश यादव की तस्वीर |
यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब लोकसभा में महिला आरक्षण बिल पर चर्चा चल रही थी। चर्चा के दौरान अखिलेश यादव ने बिना नाम लिए स्मृति ईरानी के पुराने अभिनय करियर की ओर इशारा करते हुए 'सास-बहू' सीरियल को लेकर एक तंज कसा था। इस टिप्पणी को ईरानी ने व्यक्तिगत अपमान और कामकाजी महिलाओं पर किया गया हमला करार दिया है। वाराणसी में मीडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा कि जिन लोगों को राजनीति विरासत में मिली है, उनके लिए जमीन पर मेहनत कर अपनी पहचान बनाने वाली महिलाओं पर टिप्पणी करना बहुत आसान होता है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अखिलेश यादव जैसे नेताओं को सीरियल की बातें छोड़कर संसद के गंभीर कार्यों और महिला सशक्तिकरण जैसे मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए।
स्मृति ईरानी यहीं नहीं रुकीं, उन्होंने अखिलेश यादव की राजनीतिक क्षमता को चुनौती देते हुए कहा, "मुझ जैसी एक कामकाजी महिला ने दूसरे के गढ़ (अमेठी) में जाकर वहां का परचम लहराया और कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष को हराया। अगर अखिलेश यादव में इतना ही दम है और वह खुद को बड़ा नेता मानते हैं, तो अपनी पैतृक सीट कन्नौज का मोह छोड़कर गोरखपुर से चुनाव लड़कर दिखाएं।" ईरानी ने आरोप लगाया कि विपक्ष के पास कोई ठोस मुद्दा नहीं है, इसलिए वे व्यक्तिगत आक्षेपों का सहारा ले रहे हैं। उन्होंने कहा कि वह एक करदाता और कामकाजी महिला हैं और उन्हें अपनी मेहनत पर गर्व है।
दूसरी तरफ, समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने भी इस मामले में पीछे हटने के बजाय शायराना अंदाज में अपना जवाब दिया है। स्मृति ईरानी के बयानों के बाद अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए भाजपा सरकार पर जनता से दूर होने का आरोप लगाया। उन्होंने चार पंक्तियों की एक शायरी के जरिए सरकार पर निशाना साधते हुए लिखा कि अगर सरकार की नीयत साफ होती और वह आवाम से सच में दोस्ती निभाती, तो आज उन्हें विदाई की इतनी जल्द नहीं होती। अखिलेश यादव का संकेत साफ था कि भाजपा के वादे केवल 'जुमले' हैं और जनता अब उनसे ऊब चुकी है।
इस जुबानी जंग ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक नई बहस छेड़ दी है। एक तरफ जहां भाजपा इसे महिला अस्मिता और मेहनत बनाम वंशवाद की लड़ाई बता रही है, वहीं समाजवादी पार्टी इसे सत्ता पक्ष की अहंकारपूर्ण भाषा करार दे रही है। स्मृति ईरानी ने अपने संबोधन में बार-बार इस बात पर जोर दिया कि अखिलेश यादव ने कभी कहीं नौकरी नहीं की है, इसलिए वह एक कामकाजी महिला के संघर्ष और मेहनत को नहीं समझ सकते। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश की जनता यह देख रही है कि कौन संसद में बैठकर कानून बना रहा है और कौन वहां बैठकर सीरियल्स की बातें कर रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस प्रकार की बयानबाजी आने वाले चुनावों के लिए जमीन तैयार कर रही है। स्मृति ईरानी द्वारा अमेठी की जीत का जिक्र करना और अखिलेश को गोरखपुर (जो कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का गढ़ माना जाता है) से लड़ने की चुनौती देना, सीधे तौर पर मनोवैज्ञानिक बढ़त बनाने की कोशिश है। वहीं अखिलेश यादव का शायराना हमला युवाओं और आम जनता के बीच उनकी 'सोशलिस्ट' छवि को बनाए रखने का प्रयास है। फिलहाल, दोनों नेताओं के बीच यह तीखी नोकझोंक थमने का नाम नहीं ले रही है और आने वाले दिनों में उत्तर प्रदेश की राजनीति में इसके और भी असर देखने को मिल सकते हैं।
खबर का बैकग्राउंड:
यह विवाद संसद के विशेष सत्र में महिला आरक्षण बिल (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) पर चर्चा के दौरान शुरू हुआ था। अखिलेश यादव ने महिला आरक्षण के समर्थन के साथ-साथ ओबीसी कोटे की मांग की थी, उसी दौरान उन्होंने स्मृति ईरानी के टीवी बैकग्राउंड पर तंज कसा था। स्मृति ईरानी 2019 में अमेठी से राहुल गांधी को हराकर एक 'जायंट किलर' के रूप में उभरी थीं, जबकि अखिलेश यादव वर्तमान में कन्नौज से सांसद हैं और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री रह चुके हैं।
पब्लिक इम्पैक्ट:
नेताओं के बीच इस तरह की व्यक्तिगत बयानबाजी से आम जनता के बीच मिश्रित संदेश जाता है। जहां एक वर्ग इसे मनोरंजन और तीखी राजनीति के रूप में देखता है, वहीं जागरूक नागरिक इसे विकास के मुद्दों से भटकना मानते हैं। हालांकि, महिला सुरक्षा और सशक्तिकरण जैसे गंभीर बिल पर चर्चा के समय ऐसी टिप्पणियां राजनीतिक ध्रुवीकरण को बढ़ाती हैं, जिससे असली मुद्दे कई बार पीछे छूट जाते हैं।
UP Prime News एनालिसिस:
लोकतंत्र में स्वस्थ बहस जरूरी है, लेकिन व्यक्तिगत कटाक्ष अक्सर मुख्य विधायी कार्यों से ध्यान भटकाते हैं। यह विवाद दिखाता है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति अभी भी व्यक्तित्व और विरासत के इर्द-गिर्द घूम रही है, जहां विकास से ज्यादा वार-पलटवार को महत्व दिया जा रहा है।
वाराणसी | UP Prime News
Published: April 17 , 2026| 07:27 PM IST
By UP Prime News Desk

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