उत्तर प्रदेश:
उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के शाहपुर क्षेत्र में स्थित रसूलपुर जाटान गांव इंसान और प्रकृति के बीच अनूठे तालमेल की एक अद्भुत मिसाल पेश कर रहा है। जिला मुख्यालय से करीब 25 किलोमीटर दूर बसे इस गांव में राष्ट्रीय पक्षी मोर किसी जंगल या चिड़ियाघर में नहीं, बल्कि ग्रामीणों के घरों में परिवार के सदस्यों की तरह स्वतंत्र रूप से रहते हैं। यहां के आंगन और रसोईघरों में मोरों का बेझिझक आना-जाना आम बात है। ग्रामीण न सिर्फ इन्हें दाना-पानी देते हैं, बल्कि बच्चे भी इनके साथ बेहद दोस्ताना माहौल में खेलते हैं।
.jpeg) |
| सांकेतिक फोटो : UP Prime News |
गांव के निवासी इस अनोखे लगाव की कई कहानियां साझा करते हैं। 65 वर्षीय ग्रामीण सुरेश कुमार बताते हैं कि वे बचपन से ही अपने घर-आंगन में मोरों को देखते आ रहे हैं। उन्होंने एक भावुक घटना का जिक्र करते हुए बताया कि लगभग चार वर्ष पूर्व उनके पिता कर्ता राम का निधन हो गया था, जो रोजाना चार मोरों को रोटी खिलाया करते थे। पिता के देहांत के बाद वे चारों मोर बेहद उदास नजर आने लगे और पिता की तेरहवीं तक लगातार उनके घर में ही बने रहे। ऐसा लग रहा था मानो वे पक्षी भी इंसानी परिवार के साथ शोक मना रहे हों। इसी तरह, गांव के अन्य निवासी नरेश पाल का कहना है कि मोर रात के समय पेड़ों पर बसेरा करते हैं, लेकिन दिन में वे ग्रामीणों के घरों में आ जाते हैं। कई घरों में उनके लिए विशेष रूप से दाना-पानी के पात्र रखे गए हैं।
.jpeg) |
सांकेतिक फोटो : UP Prime News
|
एक अन्य ग्रामीण पवन कुमार ने बताया कि पिछले 20 वर्षों में गांव में मोरों की संख्या काफी बढ़ गई है, जो अब दर्जनों में पहुंच चुकी है। उनके घर की रसोई में दो मोर स्थायी रूप से रहते हैं, जो अनजान लोगों से दूरी बनाकर रखते हैं और केवल परिचितों के हाथों से ही भोजन ग्रहण करते हैं। पूर्व कैबिनेट मंत्री सुधीर बालियान के पड़ोस में रहने वाली शर्मिष्ठा आर्या बताती हैं कि सुधीर बालियान के घर के पास आधा दर्जन से अधिक मोर दिखाई देते हैं। वे जब भी अपनी रसोई में खाना बनाती हैं, मोर वहीं खड़े रहते हैं और जब तक उन्हें रोटी नहीं मिल जाती, वे वहां से नहीं हटते। इसके अलावा, आठवीं कक्षा का छात्र शिवाय भी प्रतिदिन मोरों के लिए रोटी के छोटे-छोटे टुकड़े कर उन्हें खिलाना पसंद करता है।
 |
| Ai सांकेतिक फोटो : UP Prime News |
|
ग्रामीण केवल मोरों को भोजन ही नहीं देते, बल्कि बीमार या घायल होने पर उनका उचित इलाज भी कराते हैं। हाल ही में जब कुत्तों के एक झुंड ने एक मोर पर हमला कर दिया, तो ग्रामीण प्रदीप बालियान ने तत्परता दिखाते हुए उसे बचाया, उसके घावों को साफ कर मरहम लगाया और प्राथमिक उपचार दिया। इसके बाद इसकी सूचना वन विभाग को भी दी गई। यदि किसी मोर की मृत्यु हो जाती है, तो ग्रामीण पूरे सम्मान के साथ उसका अंतिम संस्कार कर उसे जंगल में दफनाते हैं। वन विभाग के विभागीय निदेशक अभिनव राज के अनुसार, वर्ष 2024-25 की गणना के मुताबिक जनपद में मोरों की संख्या लगभग 1700 है। उन्होंने बताया कि मोर एक संरक्षित श्रेणी का जीव है। आमतौर पर मोर इंसानों के पास नहीं जाते, लेकिन जब उन्हें यह विश्वास हो जाता है कि उन्हें कोई नुकसान नहीं पहुंचेगा, तो उनका व्यवहार बदल जाता है। रसूलपुर जाटान गांव में मोरों का यह आचरण इसी परस्पर विश्वास का परिणाम है।
 |
| सांकेतिक फोटो : UP Prime News |
|
खबर का बैकग्राउंड:
उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के रसूलपुर जाटान गांव में मोरों का संरक्षण और उनके प्रति ग्रामीणों का लगाव दशकों पुराना है। वन्यजीवों के प्रति इस संवेदनशील व्यवहार के कारण यह क्षेत्र प्राकृतिक सह-अस्तित्व की एक बेहतरीन मिसाल बन गया है। वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, पूरे जिले में लगभग 1700 मोर मौजूद हैं, जिनमें से एक बड़ा हिस्सा इस गांव और इसके आसपास के क्षेत्रों में सुरक्षित महसूस करता है।
पब्लिक इम्पैक्ट:
इस सकारात्मक खबर का आम जनता पर गहरा प्रभाव पड़ता है। यह समाज में पर्यावरण संरक्षण और वन्यजीवों के प्रति दयालुता की भावना को बढ़ावा देती है। ग्रामीण क्षेत्रों में इस प्रकार का सह-अस्तित्व यह संदेश देता है कि यदि मानव और वन्यजीव एक-दूसरे पर भरोसा करें, तो पर्यावरण का संतुलन और बेहतर बनाया जा सकता है। इससे नई पीढ़ी में भी प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता जागृत होती है।
UP Prime News एनालिसिस:
रसूलपुर जाटान गांव की यह घटना यह दर्शाती है कि सरकारी संरक्षण प्रयासों के साथ-साथ यदि स्थानीय समुदाय सक्रिय रूप से आगे आए, तो वन्यजीवों का संरक्षण अधिक प्रभावी और सहज हो जाता है।
मुजफ्फरनगर | UP Prime News
Published: June 4, 2026 | 10:44 AM IST
By UP Prime News Desk
कोई टिप्पणी नहीं