यूपी में जानलेवा बना 'कार्बाइड गन' का ट्रेंड: पूर्वांचल के 66 बच्चों की आंखों की रोशनी गई, सोशल मीडिया ने बरपाया कहर
वाराणसी/पूर्वांचल: उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल और बिहार के सीमावर्ती इलाकों से एक दिल दहला देने वाली खबर सामने आ रही है। इस साल दीपावली के दौरान खुशियाँ मनाने के चक्कर में एक घातक खिलौने 'कार्बाइड गन' ने मासूमों की जिंदगी में अंधेरा घोल दिया है। ताजा आंकड़ों के अनुसार, इस खतरनाक उपकरण के फटने और उसके कणों से अब तक करीब 66 बच्चों और युवाओं की आंखों की रोशनी जा चुकी है।
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क्या है पूरा मामला?
बाजार में मिलने वाली महंगी पटाखा गन (कीमत 500 रुपये से अधिक) के विकल्प के रूप में इस बार बच्चों ने सोशल मीडिया और यूट्यूब का सहारा लिया। मात्र 300 रुपये के खर्च में प्लास्टिक पाइप और कार्बाइड का इस्तेमाल कर घर पर ही 'कार्बाइड गन' तैयार की गई। सोशल मीडिया पर वायरल इस 'देसी जुगाड़' ने अब एक मेडिकल इमरजेंसी का रूप ले लिया है।
मरीजों का आंकड़ा और उम्र:
वाराणसी के बीएचयू (BHU) और अन्य निजी अस्पतालों में इलाज करा रहे मरीजों में:
30 बच्चे ऐसे हैं जिनकी उम्र 14 साल से कम है।
करीब 10 युवा 18 से 23 साल के आयु वर्ग के हैं।
बीएचयू के क्षेत्रीय नेत्र संस्थान में पिछले डेढ़ महीने में 40 केस आए, जिनमें से 22 सीधे तौर पर कार्बाइड गन के शिकार हुए।
प्रभावित जिलों में वाराणसी, आजमगढ़, गाजीपुर, मऊ, बलिया और जौनपुर के साथ-साथ बिहार के कुछ जिले भी शामिल हैं।
चिकित्सकीय स्थिति और चुनौतियाँ:
नेत्र रोग विशेषज्ञों के मुताबिक, कार्बाइड के कण आंखों में जाने से काली पुतली (कॉर्निया) बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई है और आपस में चिपक गई है। बीएचयू के विभागाध्यक्ष प्रो. आरपी मौर्य और डॉ. अनुराग टंडन जैसे विशेषज्ञों ने बताया कि कई बच्चों की सर्जरी हो चुकी है और कई की जनवरी के दूसरे हफ्ते में होनी तय है। कई मामलों में स्थिति इतनी गंभीर है कि केवल 'नेत्र प्रत्यारोपण' (Eye Transplant) ही एकमात्र विकल्प बचा है।
सार्वजनिक प्रभाव (Public Impact):
इस घटना ने अभिभावकों और प्रशासन के बीच हड़कंप मचा दिया है। यह खबर समाज को सचेत करती है कि इंटरनेट पर मौजूद हर 'DIY' (Do It Yourself) तकनीक सुरक्षित नहीं होती। छोटे दुकानदारों और ठेलों पर बिकने वाले इन सस्ते लेकिन असुरक्षित उपकरणों ने आज दर्जनों परिवारों को जीवन भर का दर्द दे दिया है।
UP Prime News विश्लेषण:
यह त्रासदी केवल एक हादसा नहीं, बल्कि डिजिटल साक्षरता की कमी और असुरक्षित मनोरंजन का परिणाम है। जब तक सोशल मीडिया पर मौजूद घातक कंटेंट पर नियंत्रण और जमीनी स्तर पर ऐसे खतरनाक खिलौनों की बिक्री पर रोक नहीं लगेगी, मासूमों की सुरक्षा खतरे में रहेगी। प्रशासन को चाहिए कि वह यूट्यूब जैसे प्लेटफार्मों के साथ समन्वय कर ऐसे ट्यूटोरियल्स को हटाने की दिशा में काम करे।
शोध और जाँच:
इस मामले की गंभीरता को देखते हुए बीएचयू ने एक विशेष शोध किया है जिसे गुवाहाटी में आयोजित 'अखिल भारतीय नेत्र चोट संस्थान' के सम्मेलन में पेश किया जाएगा। साथ ही, 'इंडियन ऑप्थल्मोलॉजिकल सोसाइटी' ने 20 डॉक्टरों की टीम बनाई है जो कार्बाइड गन से होने वाली इन चोटों का विस्तृत अध्ययन कर रही है।

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