सारनाथ के इतिहास में बड़ा संशोधन: ब्रिटिश अफसरों की जगह अब 'बनारसी' बाबू जगत सिंह को मिला खोज का आधिकारिक श्रेय, ASI ने बदला शिलालेख
वराणसी उत्तर प्रदेश
वाराणसी के विश्वप्रसिद्ध ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल सारनाथ के इतिहास में एक युगांतरकारी बदलाव दर्ज किया गया है। अब तक यह माना जाता था कि सारनाथ की प्राचीन महत्ता और यहां के अवशेषों की खोज ब्रिटिश काल के अधिकारियों जोनाथन डंकन और कर्नल मैकेंजी के प्रयासों का परिणाम थी। हालांकि, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने अब आधिकारिक तौर पर यह स्वीकार कर लिया है कि सारनाथ के ऐतिहासिक महत्व को सबसे पहले 18वीं शताब्दी में 'बनारसी' बाबू जगत सिंह ने दुनिया के सामने लाया था। इस महत्वपूर्ण शोध के बाद सारनाथ परिसर में लगे शिलालेखों को भी संशोधित कर दिया गया है, ताकि आने वाली पीढ़ियां इतिहास के इस सत्य से परिचित हो सकें।
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| सारनाथ का धमेख स्तूप और प्राचीन बौद्ध अवशेषों का दृश्य |
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने यह निर्णय लंबे समय तक चले शोध और पुख्ता ऐतिहासिक दस्तावेजों के सत्यापन के बाद लिया है। इस पूरे मामले का खुलासा जगतगंज राजपरिवार के प्रतिनिधि और बाबू जगत सिंह की छठी पीढ़ी के वंशज प्रदीप नारायण सिंह ने किया। उन्होंने बताया कि उनके पूर्वजों के इस ऐतिहासिक योगदान को मान्यता दिलाने के लिए 'जगत सिंह रॉयल फैमिली प्रोजेक्ट' (JSRFP) के तहत वर्षों तक कड़ी मेहनत की गई। अब एएसआई द्वारा इसे आधिकारिक स्वीकृति मिलने से न केवल राजपरिवार, बल्कि संपूर्ण काशी में हर्ष का माहौल है।
खोज की कहानी में आया नया मोड़
इतिहास के पन्नों में अब तक दर्ज था कि ब्रिटिश काल के दौरान सारनाथ की खोज हुई, लेकिन नए प्रमाण बताते हैं कि बाबू जगत सिंह ने 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में ही सारनाथ क्षेत्र की खुदाई और उत्खनन का कार्य शुरू करा दिया था। उस समय इस क्षेत्र में प्राचीन अवशेषों की जानकारी अत्यंत सीमित थी। बाबू जगत सिंह ने व्यक्तिगत रुचि लेते हुए इस स्थान के ऐतिहासिक महत्व को पहचाना और उत्खनन के जरिए कई महत्वपूर्ण बौद्ध अवशेषों को उजागर किया। हालांकि, बाद में जब अंग्रेजों ने भारत के पुरातात्विक स्थलों का दस्तावेजीकरण शुरू किया, तो उन्होंने स्थानीय योगदान को दरकिनार कर सारा श्रेय जोनाथन डंकन और कर्नल मैकेंजी जैसे अधिकारियों को दे दिया।
सालों के शोध का मिला फल
इस ऐतिहासिक भूल को सुधारने के लिए 'जगत सिंह रॉयल फैमिली प्रोजेक्ट' की शोध समिति ने पिछले कई वर्षों से विभिन्न अभिलेखागारों, पुस्तकालयों और प्राचीन पांडुलिपियों की खाक छानी। इस समिति ने वाराणसी के साथ-साथ देश के अन्य हिस्सों में उपलब्ध दस्तावेजों का गहन अध्ययन किया। शोध के दौरान यह स्पष्ट हुआ कि बाबू जगत सिंह द्वारा कराए गए उत्खनन के विवरण ब्रिटिश अधिकारियों की रिपोर्टों से काफी पुराने हैं। इन सभी साक्ष्यों को एक विस्तृत रिपोर्ट के रूप में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, नई दिल्ली के समक्ष प्रस्तुत किया गया था।
विद्वानों और विश्वविद्यालयों का मिला साथ
इस शोध कार्य को केवल पारिवारिक प्रयास तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि इसमें देश के प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानों का भी सहयोग लिया गया। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU), कोलकाता विश्वविद्यालय, लखनऊ विश्वविद्यालय और पटना विश्वविद्यालय के वर्तमान एवं सेवानिवृत्त इतिहासकारों ने दस्तावेजों के परीक्षण में मार्गदर्शन किया। काशी के स्थानीय इतिहासकारों और विद्वानों ने भी इस मुहिम को अपना समर्थन दिया। इसके अलावा, वाराणसी गाइड एसोसिएशन और आकाशवाणी जैसे संस्थानों ने भी इस मुद्दे को व्यापक स्तर पर उठाकर जन जागरूकता बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई।
शिलालेखों में हुआ ऐतिहासिक सुधार
इतिहास की इस सच्चाई को स्थापित करने के लिए सारनाथ परिसर में स्थित धर्मराजिका स्तूप से संबंधित शिलालेख (शिलापट्ट) को बदल दिया गया है। नया शिलालेख अब आधिकारिक तौर पर बाबू जगत सिंह के योगदान को रेखांकित करता है। प्रदीप नारायण सिंह के अनुसार, यह सुधार प्रक्रिया का हिस्सा है जिसे चरणबद्ध तरीके से लागू किया जा रहा है। 26 दिसंबर को सारनाथ परिसर में शिलालेख के संशोधन की प्रक्रिया को एक निर्णायक मोड़ मिला, जिससे अब पर्यटकों और शोधार्थियों को सही ऐतिहासिक जानकारी मिल सकेगी।
प्रधानमंत्री की प्रेरणा और विरासत का सम्मान
इस ऐतिहासिक सुधार के पीछे देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उस दृष्टि को भी श्रेय दिया जा रहा है, जिसमें उन्होंने 'विकास भी और विरासत भी' का नारा दिया है। स्थानीय लोगों और राजपरिवार का मानना है कि प्रधानमंत्री द्वारा भारतीय संस्कृति और इतिहास के गुमनाम नायकों को सम्मान देने की प्रेरणा ने इस कार्य को गति दी। यह संशोधन इस बात का प्रमाण है कि औपनिवेशिक काल के दौरान भारतीय व्यक्तित्वों के जिन योगदानों को दबा दिया गया था, उन्हें अब वर्तमान सरकार और संस्थाओं के सहयोग से पुनः स्थापित किया जा रहा है।
खबर का बैकग्राउंड:
सारनाथ वह पवित्र स्थान है जहां भगवान बुद्ध ने अपना प्रथम उपदेश (धम्मचक्कपवत्तन सुत्त) दिया था। सदियों तक यह स्थान उपेक्षित रहा और टीलों के नीचे दबा रहा। 18वीं और 19वीं शताब्दी में इसके पुनरुद्धार की प्रक्रिया शुरू हुई। अब तक के इतिहास लेखन में ब्रिटिश अधिकारियों को ही इसका श्रेय दिया जाता रहा, लेकिन बाबू जगत सिंह (जो काशी नरेश के दीवान थे) के मूल योगदान को एएसआई ने अब जाकर सही स्थान दिया है।
पब्लिक इम्पैक्ट:
इस बदलाव का सीधा असर इतिहास के विद्यार्थियों, शोधार्थियों और पर्यटकों पर पड़ेगा। अब उन्हें सारनाथ के इतिहास का भारतीय दृष्टिकोण और स्थानीय योगदान जानने को मिलेगा। यह कदम भारतीय गौरव को बहाल करने और औपनिवेशिक मानसिकता से बाहर निकलने की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि है। वाराणसी के पर्यटन में भी इससे एक नया अध्याय जुड़ेगा, जहां लोग अब बाबू जगत सिंह की दूरदर्शिता के बारे में भी जान पाएंगे।
UP Prime News एनालिसिस:
यह संशोधन केवल एक नाम बदलने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह भारतीय इतिहास के 'डिकोलोनाइजेशन' (वि-उपनिवेशीकरण) का एक जीवंत उदाहरण है। स्थानीय ऐतिहासिक योगदानों को वैज्ञानिक प्रमाणों के साथ स्वीकार करना भारतीय पुरातत्व और गौरवशाली अतीत के प्रति एक न्यायपूर्ण कदम है।
वाराणसी (उत्तर प्रदेश) | UP Prime News
Published: march 10, 2026 | 01:58 PM IST
By UP Prime News Desk

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