इटावा में डिजिटल अरेस्ट गिरोह का भंडाफोड़: चार सगे भाई गिरफ्तार, 91 लाख से अधिक की नकदी और डिजिटल राशि बरामद
उत्तर प्रदेश :
उत्तर प्रदेश के इटावा जिले में पुलिस ने साइबर अपराध के खिलाफ एक बड़ी सफलता हासिल की है। जिले की बसरेहर थाना पुलिस ने एक सक्रिय साइबर ठगी गिरोह का भंडाफोड़ किया है, जिसमें सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि ठगी के इस पूरे खेल को चार सगे भाई मिलकर अंजाम दे रहे थे। पुलिस ने चारों आरोपियों को गिरफ्तार कर उनके पास से कुल 91 लाख 17 हजार रुपये की भारी-भरकम राशि बरामद की है। इसमें से लगभग 30.60 लाख रुपये नकद बरामद किए गए हैं, जबकि शेष 60 लाख रुपये से अधिक की राशि उनके विभिन्न डिजिटल खातों में फ्रीज कराई गई है।
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| गिरफ्तार आरोपी फोटो :UP Prime News |
वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) बृजेश श्रीवास्तव ने मामले का खुलासा करते हुए बताया कि यह गिरफ्तारी 25 अप्रैल की रात को नियमित चेकिंग के दौरान हुई। पुलिस की एक टीम लोहिया नहर पुल के पास गश्त और चेकिंग कर रही थी, तभी दो मोटर साइकिलों पर सवार चार युवकों ने पुलिस को देखकर भागने का प्रयास किया। पुलिस ने संदिग्ध गतिविधि को भांपते हुए उनका पीछा किया और घेराबंदी कर चारों को धर दबोचा। पूछताछ के दौरान जो तथ्य सामने आए, उसने पुलिस प्रशासन को भी सतर्क कर दिया है। पकड़े गए चारों भाइयों की पहचान सतीश कुमार, हरिओम, अखिलेश कुमार और अजीत कुमार के रूप में हुई है।
जांच में सामने आया है कि इस गिरोह का मुख्य सरगना सतीश कुमार है। सतीश के खिलाफ विभिन्न राज्यों में ठगी और साइबर अपराध के लगभग 20 मामले पहले से ही दर्ज हैं। पुलिस की पूछताछ में पता चला कि सतीश कुछ समय पहले हरियाणा के पानीपत में साइबर ठगों के संपर्क में आया था। वहां उसने ठगी के नए-नए तरीकों, विशेषकर 'डिजिटल अरेस्ट' (Digital Arrest) और ऑनलाइन गेमिंग के माध्यम से लोगों को शिकार बनाने की ट्रेनिंग ली। इसके बाद वह वापस अपने गांव लौटा और अपने तीन अन्य भाइयों को भी इस काली कमाई के धंधे में शामिल कर लिया। गिरोह ने इतनी सफाई से काम किया कि कुछ ही समय में उन्होंने करोड़ों का लेन-देन शुरू कर दिया।
गिरोह के काम करने का तरीका अत्यंत शातिर था। ये लोग भोले-भाले लोगों को ऑनलाइन गेम के जरिए फंसाते थे और फिर 'डिजिटल अरेस्ट' का डर दिखाकर उनसे मोटी रकम ऐंठते थे। डिजिटल अरेस्ट की प्रक्रिया में आरोपी खुद को सरकारी अधिकारी या पुलिस बताकर लोगों को वीडियो कॉल के जरिए डराते थे और उन्हें 'डिजिटल कैद' में रहने का झांसा देते थे, ताकि वे डरकर पैसे दे दें। ठगी की गई रकम को ये सीधे अपने खातों में नहीं मंगवाते थे, बल्कि दूसरे बैंक खातों का उपयोग करते थे ताकि पुलिस की पकड़ से बच सकें। पुलिस को इस पूरे सिंडिकेट में कुछ बैंक कर्मियों की संलिप्तता का भी संदेह है, जिसकी जांच की जा रही है।
खबर का बैकग्राउंड:
उत्तर प्रदेश में हाल के महीनों में 'डिजिटल अरेस्ट' और ऑनलाइन निवेश के नाम पर ठगी के मामलों में भारी वृद्धि हुई है। इटावा पुलिस को लंबे समय से इस गिरोह के सक्रिय होने की सूचनाएं मिल रही थीं। आरोपियों ने पानीपत से सीखे गए तकनीकी कौशल का उपयोग करके ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों के लोगों को निशाना बनाया था। मुख्य आरोपी सतीश पहले से ही साइबर सेल की रडार पर था, जिसकी गिरफ्तारी ने एक बड़े अंतर्राज्यीय नेटवर्क की जड़ों तक पहुंचने में मदद की है।
पब्लिक इम्पैक्ट:
इस बड़ी कार्रवाई से आम जनता के बीच पुलिस के प्रति विश्वास बढ़ा है। हालांकि, यह घटना एक चेतावनी भी है कि ठग अब नए तरीकों जैसे 'डिजिटल अरेस्ट' का इस्तेमाल कर रहे हैं। इस खुलासे के बाद लोगों को जागरूक होने की आवश्यकता है कि पुलिस या कोई भी सरकारी एजेंसी कभी भी वीडियो कॉल के माध्यम से 'डिजिटल अरेस्ट' नहीं करती है। इस तरह की घटनाओं से बचने के लिए अज्ञात नंबरों से आने वाले संदिग्ध वीडियो कॉल से सावधान रहना जरूरी है। बैंक कर्मियों की संदिग्ध भूमिका ने ग्राहकों की डेटा सुरक्षा पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
UP Prime News एनालिसिस:
साइबर अपराध की दुनिया में 'डिजिटल अरेस्ट' एक नया और गंभीर खतरा बनकर उभरा है। पुलिस द्वारा 91 लाख रुपये की बरामदगी यह दर्शाती है कि यह गिरोह कितना संगठित था। बैंक कर्मियों की मिलीभगत की जांच साइबर सुरक्षा ढांचे की खामियों को उजागर कर सकती है, जिसे सुधारना भविष्य की ठगी रोकने के लिए अनिवार्य है।
इटावा | UP Prime News
Published: April 27, 2026 | 03:17 PM IST
By UP Prime News Desk

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